Wednesday, September 25, 2013

कृष्ण !

August 22, 2012 at 2:17pm
 कृष्ण !
पहले एक मनुष्य
कृष्ण !
फिर एक ईश्वर
संपूर्ण पुरुष व्यक्तितत्व
कभी सार कभी सारथि
कभी नेता कभी  नीतिज्ञ
कभी सखा कभी रसिया
रोम रोम में बसने वाले
पहले भी थे
आज भी हैं   और
निश्चय ही कल भी होंगे
चेतन अचेतन सत्य असत्य से परे
आदि  अनादी अनंत  जीवन्त
परोक्ष अपरोक्ष के उस पार
ओम से ओमकार को भेदते
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में निहित
सदैव विभिन्न रूपों में
मानव कल्याण हेतु
जन्म जन्मान्तर तक आते रहेंगे 

स्मरण करें ; कन्स उनका बाल बाँका  कर सका
पूतना ने तो स्वयं ही नेत्र बंद कर लिए
शिशुपाल को उसके सौ अपराध क्षम्य थे
ये कृष्ण ही कर सकते थे  !
और जब द्रौपदी का बीच सभा में
दु:शासन द्वारा चीर हरण हो रहा था
उन सभी ज्ञानियों की मूक सभा में
एक केवल कृष्ण ही थे अप्रत्यक्ष
जिसने द्रौपदी को नारी होने की गरिमा लौटाई
कृष्ण ने महाभारत संग्राम की नींव रखी
इसलिए क्या तुम और मैं कलंकित कर सकते हैं कभी ?
क्या दु:शासन का दु:साहस ,ध्रष्टता हो सकेगी क्षम्य ?

कृष्ण जो पारखी भेद सकते अचूक 
पर उस कृष्ण को कौन भेद सका 
वाही जो सहज सरल विनम्र हो अर्जुन सा
प्रेम से बंधा मीरा राधा की तरह
कृष्ण को प्राप्त किया 
निष्ठावान प्रहलाद ने
जब सारे राग द्वेष प्रतिस्पर्धा पे  विजय  पा लो
तब कृष्णमय होगा ये 
जीवन सागर के अमृत मंथन के  
हिचकोलों के मध्य ......! !

No comments:

Post a Comment