Wednesday, September 25, 2013

गरज गरज घन गरजे बदरा  बरसे घटा घनघोर 
कड़क कड़क कड़कती दामिनी 
अचंभित करती जाती चहुँ ओर
कानों में बस गीत गूंजता राग मल्हार का
संगीत रुनझुन रिमझिम बारिश का
ठंडी ठंडी फुहारों का मचलती इठलाती पवन का
सोंधी महकती माटी करती वन धरती गगन मगन विभिन्न रंग 
नाच उठती वसुंधरा हर इक छोर 
भीजता मन प्रेम अगन से होता हौले हौले झिंझोर
सावन आता मन सु मन लुभाता
स्मरण आता श्याम मोर चितचोर
प्रिय का वह संग अनूठा
बंधन करता तन मन सराबोर
सावन का हर रूप करता
चकित भ्रमित अधीर घनघोर
प्राण प्रिय स्मृति मन भरता
अमृत रस मन विभोर
दे जाता आनंद धन
सींचता प्रेम की डोर
गरज गरज बरस जा बदरा

प्यासी धरती को दे जा  सुधा रस चहुँ ओर ....... 

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