Wednesday, September 25, 2013

इत्तेफाक

September 3, 2012 at 5:37pm
कैसा था ये अजीबोगरीब इत्तेफाक
राह चलते अक्सर मिल जाता वो मुझे
छिप छिप के मुझे देखता रहता
मैं भी उसे पलट के कभी देख लेता
न थी कोई यारी दोस्ती दीवानों सी
बस एक अनजाना सा रिश्ता बन गया दोनों ओर
वह भी कुछ कहना चाहता था मुझसे
मैं भी सुनना चाहता था उसे
पर ज़िन्दगी ने अपनी रफ़्तार यूँ बढाई
इस जीवन की आपा-धापी में
चलते रेले  बढ़ते मेले में गुम हुआ कहीं
की फिर तलाश न सका चाह कर भी
यूँही ख्वाम्खा खो दिया उसने मुझे तभी
की फिर पाया उसी जगह उसने मुझे
की जब जब कदम डगमगाए नई राहों पे
उसकी अनजान बाहों ने थामा मुझे
जब जब हौसले चूर-चूर हुए
उन्ही अनजान नज़रों ने बुलंद किये फैसले मेरे
कैसे भूलूं उन्ही अनजान नज़रों ने तराशा है मुझे
कैसा अजीबोगरीब इत्तेफाक था ये  !
की खुद से मिलना इससे पहले इतना हसीन न था......!!

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