इत्तेफाक
कैसा था ये अजीबोगरीब इत्तेफाक
राह चलते अक्सर मिल जाता वो मुझे
छिप छिप के मुझे देखता रहता
मैं भी उसे पलट के कभी देख लेता
न थी कोई यारी दोस्ती दीवानों सी
बस एक अनजाना सा रिश्ता बन गया दोनों ओर
वह भी कुछ कहना चाहता था मुझसे
मैं भी सुनना चाहता था उसे
पर ज़िन्दगी ने अपनी रफ़्तार यूँ बढाई
इस जीवन की आपा-धापी में
चलते रेले बढ़ते मेले में गुम हुआ कहीं
की फिर तलाश न सका चाह कर भी
यूँही ख्वाम्खा खो दिया उसने मुझे तभी
की फिर पाया उसी जगह उसने मुझे
की जब जब कदम डगमगाए नई राहों पे
उसकी अनजान बाहों ने थामा मुझे
जब जब हौसले चूर-चूर हुए
उन्ही अनजान नज़रों ने बुलंद किये फैसले मेरे
कैसे भूलूं उन्ही अनजान नज़रों ने तराशा है मुझे
कैसा अजीबोगरीब इत्तेफाक था ये !
की खुद से मिलना इससे पहले इतना हसीन न था......!!
राह चलते अक्सर मिल जाता वो मुझे
छिप छिप के मुझे देखता रहता
मैं भी उसे पलट के कभी देख लेता
न थी कोई यारी दोस्ती दीवानों सी
बस एक अनजाना सा रिश्ता बन गया दोनों ओर
वह भी कुछ कहना चाहता था मुझसे
मैं भी सुनना चाहता था उसे
पर ज़िन्दगी ने अपनी रफ़्तार यूँ बढाई
इस जीवन की आपा-धापी में
चलते रेले बढ़ते मेले में गुम हुआ कहीं
की फिर तलाश न सका चाह कर भी
यूँही ख्वाम्खा खो दिया उसने मुझे तभी
की फिर पाया उसी जगह उसने मुझे
की जब जब कदम डगमगाए नई राहों पे
उसकी अनजान बाहों ने थामा मुझे
जब जब हौसले चूर-चूर हुए
उन्ही अनजान नज़रों ने बुलंद किये फैसले मेरे
कैसे भूलूं उन्ही अनजान नज़रों ने तराशा है मुझे
कैसा अजीबोगरीब इत्तेफाक था ये !
की खुद से मिलना इससे पहले इतना हसीन न था......!!
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