ज़ख्म ऐसा मिला की तुम भुला न पाओगे
जूनून ऐ इश्क की डगर पर संभल न पाओगे
मौला से रहमत करम की दुआएँ मांगोगे
झोली फैला के सज़दे में सर झुकाओगे
है यकीं हमें तेरे कमाल के फनकार का
मगर एक रोज़ मेरी ही ग़ज़ल गुनगुनाओगे
चाँद भी सो गया अँधेरा कर यारब
मगर मेरी आँखों में देखोगे तो रौशनी पाओगे
कितनी शोख़ हसीन हैं ये नज्में मेरी
देख कर तुम भी तो थोड़ा मचल जाओगे
अब रहने भी दो न इतराओ तुम इतना
मिलने का वादा कर यूँही चले जाओगे
नज़्म....
No comments:
Post a Comment