फितरत....
परिन्दें दरख्तों पर चेह्चहातें हैं
घरों से निकालनें को उक्सातें हैं
घरों की रौनक दरों-दीवार से क्या
हाले- दिल चेहरे बतलातें हैं
मासूम दिलों से निकलती जो आहें
आती हैं जब पाती है ठेस
कभी कोई लफ्ज़ तो कभी कई अलफ़ाज़
हो जातें हैं तेज़
अंदाज़ तो वही आपका सब को लुभाता hai
लहज़ा तेरा जब दिल चीर कर जाता है
कमाल होता है जब बोल पड़ते है किस्से
और इंसान ख़ामोश हो जाता है...........
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