दूर शहर से दूर....
दूर शहर से दूर
भरी आबादी घनी बस्ती से दूर
जामुन और आम के पेड़ों से सजी वो कोठी
अब सिर्फ कोठी ही है
उसके बड़े-बड़े हॉल जैसे कमरों में
अब बस 'फर्नीचर ' है;
वहां एक कमरा आँगन के उस पार भी है
वह बहुत अरसे से बंद पड़ा है
उस कमरे से जुड़ी बहुत सी यादें हैं
जो यादें आज भी ताज़ा तरीन हैं
किसी नर्गिस के फूल की तरह
आसमां में जन्मे नए उजले तारे की तरह
आज भी उस कमरे के खुलने पर
वहां बच्चों के हंसने की किलकारी की गूँज सुनाई देगी
चोर-सिपाही और पकड़न -पकड़ाई जैसे खेलों की धमा-चौकड़ी महसूस होगी
अम्मा का कहानी सुनना
लोरी गाते थपकी देके सुलाना
उसका नरम अहसास आज भी उतना ही कोमल होगा जितना तब था
अरसा हुआ,अम्मा अब नहीं रहीं
कमरा बंद पड़ा है
वहाँ अब कोई आता-जाता नहीं
किसी को समय नहीं है
कोई ज़रूरत भी नहीं है
जहाँ किलकारी गूंजती थी
वहां अब धूल और जाले बसतें हैं
वह जगह बंद है
तमाम यादें क़ैद कर उसपे ताले पड़ गए हैं
चाबी गुम हो चली है
वहां कोई आ जा नहीं सकता
तन्हाई सुकून ने पहरा जो डाल रखा है..
यादें दूर बहुत दूर सिमटीं हुई हैं
अब कोई आता जाता नहीं हैं.....! !
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