कितना अच्छा होता हम. . . .
कितना अच्छा होता हम आने वाले कल को पहले से ही जान लेते
सारे दुःख सारे दर्द की दवा पहले से ही तैयार कर लेते
हर आने वाली आह्ट का होता पता
हर आने वाली आह्ट का होता पता
न होती कोई फ़िक्र
सुलझती हर चिंता हर जंग की समस्या
छा जाती तब चैन सुकून की घडीयाँ
दुखों का जब पहले से कर लेते निवारण
तब हर ओर मनता सुखों का लगातार जश्न
रोक-टोक से मिलती आज़ादी
पाबन्दी से मुक्ति
स्वछन्द घूमते अपनी धुन में हो छुट्टे सभी
दूरदर्शी होते सब और दूरदर्शिता सबका अनोखा गुण
मिलते नए रास्ते न होती कोई उधेढ़-बुन
भर-भर कर रखते पहले से ही सभी
पेट्रोल,चीनी ,तेल,गैस,गुड़....!
फिर क्या-क्या कर सकते थे
सोचो ,ये नेता भ्रष्ट मंत्री सारे
ज़ुबान तो बदलते ही हैं बदलते अपने मुखौटे बेचारे !
लगी रहती 'फौरेन ' जाने की होड़
कोई जाता जब उस देस न पलटता इस छोर
कुछ भी कहो तुम !
होता सभी का वारा-न्यारा
जब पहले से जनता करती चौपट इनका दायरा
उठता जाता सबका राज औ रजवाड़ा
उतरता रंगीन चश्मों का रंगीन नज़ारा
खुलती जाती परतें सारी,उतारते सभी खोल
कितना अच्छा होता हम भेद लेते पहले से ही सबकी पोल....!
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