एक दस्तक !
हौले से दे जाए जब दिल पे दस्तक कोई
हाले दिल बयाँ करना है मुश्किल
संभलती नहीं खुशी इतनी कि छलकती शीशे से जैसे कोई
आरजू जो पूरी होती नहीं !
हर शाम-ओ-सहर रंगीन हो उठती है
लिख देतें हैं हवाओं पे तेरा ही नाम
दरीचों के दरमियाँ से झिलमिलाती रौशनी
जैसे लाती है तेरे आने का पैग़ाम
अच्छी लगती है सुब्बु कि दस्तक हौले से
दर पे आँखें बिछाए बैठे हैं पीछा छुढाके सबसे
अच्छी लगती नहीं किसे ऎसी दस्तक
ज़िंदगी में बहार कि एक आहट की दस्तक
बागों में रंग और तितलियों की दस्तक
आसमाँ में परिंदों के चहकने कि दस्तक
सहर में हर ओर एक पाकीज़गी कि दस्तक
नए जहाँ में अमन ओ चैन कि एक दस्तक
वहशत जो देती है दहशत उससे निजात कि दस्तक
ज़हर से भरी दरिंदगी कि रुखसती कि दस्तक
सौदेबाजी के सट्टे बाज़ारों खरीदफरोख्त से छुटकारे कि दस्तक
अच्छी किसे लगती है सियासत ,चालों ,रंज कि दस्तक
हौले से जब दे जाए मासूमियत अपनी दस्तक
ऐसे में अच्छी किसे नहीं लगती उन मसीहाओं कि वो एक दस्तक
अच्छी किसे लगी है
नुमाईश कि दस्तक; बेहुदगी की दस्तक
छुटकारा मिले इन तमाम बलाओं से
ले आओ गुलशन में बेला गुलाबों कि दस्तक
ज़रूरत है हमें सच्ची दोस्ती कि दस्तक
जैसे चाँद को चाँदनी कि दस्तक
सारे जहाँ को दरियादिली कि दस्तक
अच्छी किसे नहीं लगती मोहब्बत कि एक दस्तक. . . .
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