Wednesday, September 25, 2013

        कर्म का चक्रव्यूह 
कर्म और कर्तव्य दोनों ही जीवन के प्रधान हैं
विधि के विधान भी इन्ही के आधार हैं
कर्म की कुंजी है अति न्यारी
प्रारब्ध के ताले खोल देती भारी से भारी
कर्म धर्म है और धर्म  कर्म
राग-द्वेष मोह इसके प्रलोभन
जीवन-काया मोह ताज कर जब उठते जन
कर्तव्य कर्म अधिक निखरते संवरते हर मन
युग-युग साक्षी है 
शरीर रुपी पिंजड़े में पूर्वजन्म के कर्म काटने
विविध रूपों में रचती, बसती ,भटकती है आत्मा
यथार्थ है तब,जब स्व भूलकर मानव
राग-द्वेष के सागर में गोते लगाता 
पथ -भ्रंथ होकर भी एकाग्र एकल चाल चलता 
मानव स्वयं को सोने-चाँदी की ज़ंजीर में जकड़ा रखता
मिथ्या जगत, मिथ्या शान लक्ष्य विहीन मिथ्या ज्ञान
मिथ्या पथ पर ही आनंदित हो चलता
मोह से वशीभूत यहाँ वहां भटकता
बीतें दिन,युग,कल्प कितने ही
बंधन पर बंधन यहाँ जन्म से मरण तक बंधते
कर्म के चक्रव्यूह कसते जाते
मानव भेद सकता है चक्रव्यूह रचना जत्न से
निष्काम निःस्वार्थ कर्म से ही ऊपर उठता वेग से
टूटते हैं तब सारे बंधन 
कट जातें हैं सभी कर्मों के बंधन
जीत चक्रव्यूह से पाता है
उन्मुक्त हो तरता है
कर्म की जीत से स्वयं का उद्धार करता है.........

No comments:

Post a Comment