कितना अच्छा था जब हम छोटे बच्चे थे
खाते थे खेलते थे
झगढ़ते रूठते थे
मनाना इक दूजे को कितना सरल था
इक ओर अश्क बनते मोती
दूसरी ओर होती मुस्कान
उम्र का इक और दौर आया
चोट लगती ज़ख्म गहरा
शेर बनते ताजे पर कच्चा लहजा
आँखें बोलती लब मुस्कुराते
डूबते डूबते हम बचते तिनकों के सहारे
ज़िन्दगी का अहसास इन्ही लम्हों में मिला
जब नश्तर चुभा खंजर लगा
दिल को चीरता एक जूमला मिला....! !
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