गीत -ऋतु फाल्गुन की आयी
ऋतु फाल्गुन की आई
साजन का संदेसा लायी
ठण्ड गुलाबी छायी
खिली धुप गुनगुनायी
उजली किरण शर्मायी
मंद-मंद सजनी मुस्कायी
ऋतु फाल्गुन की आयी
प्यार की बौछार लायी
रंगों की सौगात लायी
ठण्ड गुलाबी छायी
ऋतु फाल्गुन की आयी
साजन बैरागी की राह तके सजनिया
राह देखे नैन तरसे थक गयी अंखियाँ
रंग बरसे,छलके हर ओर-शोर
मन तरसे इस छोर पोर-पोर
तन भीज-भीज जाए चुनर डोर-डोर
सजनी का मन झूमे जैसे चाँद चकोर
नैन उठे धीरे-धीरे
पग बढ़े धीमे-धीमे
दिल धड़का जोर-जोर
जब सांकल खड़खड़आई
जब सांकल खड़खड़आई ..
फाल्गुन ऋतु आयी
साजन का संदेसा लायी
टुक-टुक अँखियाँ देखे
साजन की बाट जोहे
छर-छर बौछार आये
रंगों की फुहार आये
तरसी सजनिया कैसी मुरझायी ,कैसी मुरझायी
साजन बैरी झूठा साजन का संदेसा झूठा
नैहर छूटा संखियों का मेला छूटा
रूठी सजनिया छूटी संखियाँ सजनिया कुम्लाही
अधर की मुस्कान छूटी
नैना रूठे निंदीया टूटी सारी कारी रात घबराई
झर-झर मोती अन्खीयाँ झरती
सब बैरी बन मुस्कायी
बिंदिया रूठी मुंदरी रूठी
चूड़ी छल्ले से रूठी
कंगना रूठा पायल छूटी
बिखरा गजरा छूटा कजरा
साजन को देख-देख तरस जाए मुखड़ा
फाल्गुन की ऋतु आयी
ठण्ड गुलाबी छायी
रंग को रस को तरसे जियेरा
रंग को रस को तरसे जियेरा
छंद गीत को तरसे
जैसे धरती को अम्बर तरसे
अम्बर को धरती तरसे
गुलाल अबीर उड़े हर गाल पे
सजनी साजन को तरसे
थिरक -थिरक पग धर ऊपर -नीचे
थिरक-थिरक पग धर ऊपर-नीचे
हिलते डुलते बंदन द्वार
साजन के दरसन को तरसे
कबसे बैठी सजनी दिल-हार
ऋतु फाल्गुन की आयी सजना
मैं बैठी कबसे पंथ-निहार
मैं बैठी कबसे पंथ-निहार. . . .
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