Wednesday, September 25, 2013

    एक ख़्वाब था ...
एक ख़्वाब था मगर किधर गया या 
बिखर गया कुछ पता नहीं
ख़याल भी उड़ा-उड़ा सा था
सिरा उसका मिला नहीं
जाने जाने दिल को हुआ क्या
कहाँ चोट लगी कुछ पता नहीं
सवाल था या जाल था
चुप रहा हल कभी मिला नहीं
सुकूँ तलाशता रहा तन्हा दिल कभी जुड़ा नहीं
अजब कश्मकश रही गज़ब आंधीयाँ चली
डूबती कश्ती को कभी किनारा मिला नहीं
हाले-दिल बयां किया जुबां चुप-चुप रही
नज़रों ने राज़ खोल दिए ख़ामोशी चलती बनी
शाम ढलने लगी रात छाने लगी
महफ़िले सजती रही शम्मा बुझती रही
रह रह के याद गयी तेरी हसीं शोखीयां 
हाल और क्या कहूँ खुद का भी कुछ पता नहीं

खुद का भी कुछ पता नहीं.....

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