यूँही खामखाँ मुस्कुराता नहीं कोई....
यूँही खामखाँ मुस्कुराता नहीं कोई
ढेरों ग़म सीने में जब छिपाता कोई
तर होती हैं नमी से आँखें
जब हौले से दुखती नब्ज़ दबाता कोई
फेर लेतें हैं नज़रें यूँही जब
चुपके से दिल के करीब आता कोई
शिकन माथे की बयान करती हैं दास्ताँ
तूफ़ान आये कितने ही पर मिला न साहिल कोई
खामोश रहकर न करें कभी शिकवा गिला कोई
समझें इसे कोई बदगुमानी मेरी
गुजारिश है की छेड़े न बेकरार का करार कोई
छीने न जीने का हमसे सहारा कोई
की.. जिन दरख्तों के साए तले पनाह पातें हैं
उन्ही दरख्तों की शाखें न काटे कभी कोई
यूँही खामखाँ मुस्कुराता नहीं कोई...........
ढेरों ग़म सीने में जब छिपाता कोई
तर होती हैं नमी से आँखें
जब हौले से दुखती नब्ज़ दबाता कोई
फेर लेतें हैं नज़रें यूँही जब
चुपके से दिल के करीब आता कोई
शिकन माथे की बयान करती हैं दास्ताँ
तूफ़ान आये कितने ही पर मिला न साहिल कोई
खामोश रहकर न करें कभी शिकवा गिला कोई
समझें इसे कोई बदगुमानी मेरी
गुजारिश है की छेड़े न बेकरार का करार कोई
छीने न जीने का हमसे सहारा कोई
की.. जिन दरख्तों के साए तले पनाह पातें हैं
उन्ही दरख्तों की शाखें न काटे कभी कोई
यूँही खामखाँ मुस्कुराता नहीं कोई...........
No comments:
Post a Comment