Wednesday, September 25, 2013

एक बार फिर से वही शोर........... वही सर्द हावैएं
अंगुली उठाती आवाजें !
चलो.... लुक्का - छिपी का खेल खेलतें हैं
चोर - सिपाही बुन यिक दूजे पर सच्चाई की दावे करतें हैं 
रिश्तों को तराजू मैं तोल्तैं हैं 

इल्जामतो को हावी होने देतें हैं
शक ओ शुबहा के साथ वक़्त गुजारतें हैं 
भर्म को सच जान लेतें हैं 
और रिश्तों को ?..................
रिश्तों को कच्ची बखियान की तरह उद्हदेने देते हैं
हर एक नए पुराने मोड़ पर आजमाईश करतें हैं !!!

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