Wednesday, September 25, 2013

                           एक मंज़र
बादलों को चीर के चमक उठी रेशमी किरने 
अपने आग़ोश में सिमटा कर सूना कोहरापन
उठी जब धुंद खिल उठे राहगुज़र
दूर खड़े दरख्तों ने भी पहरे उठाये
खुला आसमाँ  हँसता मुस्कुराता 
परिंदों को उड़ने का आज़ाद मौका देता
चेह्चाहते परिंदे उड़ते लहलहाते मैदानों में
हरे-भरे चौबारों में खिलते खुलते किवाड़ 
मुस्कुराते चहकते दिए करते हर घर गुलज़ार

हज़ारों उम्मीदों के चराग एक साथ जगमगाए...........!!

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