गर्मी की रातों में
घर के चौबारों में
पानी के छिड़काव से ठंडक
जो तब थी ,वो अब कहाँ
सर्द जाड़े की मखमली धूप
चढ़ मुंडेर छत की
लेते चाय का घूँट
यारों के संग गप्पों का मज़ा
मुंह से निकलता जब धुआं. . . .
स्कूल से लौटते,
जब चढ़ पेड़ों पर जामुन तोड़ते
वो पट-पट गिरते जामुन में,
अब वो बात कहाँ. . . .
रसोई में चौकी पर भोजन
अम्मा के हाथों की रोटी का सेवन
गर्म अंगीठी,जलती-बुझती
अम्मा की डांट से भूख भी खुलती !
बारिशों का मौसम ऐसा
बढ़ता पानी रेले जैसा
आ जातीं फिर कागजों की कश्ती
दूर देस की परियों की कहानी
सुनते-सुनाते
न थकते हम मुहँ जुबानी
देर रातों तक जागना,बातें करना
'अमीन सयानी ' का 'बिनाका संगीत 'सुनना
हाय ! अब वो बात कहाँ. . . .
होली के त्यौहार पर
भर ढेरों पानी के गुब्बारे
उधम-मस्ती करते बच्चे सारे
पर अब वो बात कहाँ. . . .
सूने पड़े सारे गलियारे
मोहल्ले सभी चौबारे सारे
जंगले ही जंगले दिखने लगे
बंगले लेकिन कंगले हो चले
इमारतें हुई गगनचुम्बी
इंसानों के दिल हुए तंगी
न मिलने का शौक रहा
इसमें कुछ वक़्त का भी हाथ रहा. . .!
अब रहे सब अपने जंगले में क़ैद
महफिलों से दूर सिर्फ सामानों से लैस. . .!
अब ज़ेहन में सिर्फ यादों के साए
हँसी के फुव्वारे कैसे लुटाये
लेकिन,अब वो बात कहाँ.. . .
जाने अब वो बात कहाँ . . . . . . .
जाने अब वो बात कहाँ . . . . . . .
No comments:
Post a Comment