ग़ैर ही हो भले पर सुने तो सही
हाँ मेरी नज़्म का लुत्फ़ उठाये सही
न जाने मिली किस ख़ता की सज़ा
कोई तो बता दे हमें तो कभी
चश्मेकुर्नुम भले भीजते ही रहे
खंजर खा कर हम मुस्कुराये यूँही
करें अपनों से क्या गिला शिकवा
ग़ैरों ने रस्में निभायीं सभी
पलकें गिरती उठती चिलमनों की तरह
उनकी ये अदा भी गज़ब ढाती गयी
उनकी जुस्तजु उन्ही की गुफ़्तगू
रह रह के हमें सताती रही
मौत के हवाले तो सब हैं ही मगर
बात तो है जब ज़िन्दगी ,ज़िन्दगी से मिलती रही
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