आस का दर्पण
नारी हूँ दर्पण देखना मेरा अधिकार है
नारी हूँ जीवन श्रृंगार ,सौंदर्य प्रधान है
मै काजल,टिकली ,मिस्सी की बात नहीं कर रही...
सहनशीलता ,ममता की भी नहीं
अरे ! इन्ही का लाभ उठाया सबने
ऐसा मेरा काम वाली बाई का कहना है.........
''जब जब बाहर जाती हूँ घर से काम करने
यही सब अलंकृत किये हैं श्रृंगार के नाम पर
किसी ने कैसा लांछन लगाया तो किसी ने नज़रों से घूरा ''
एक दिन वह मुझे बुझी-बुझी सी लगी,यूँही पूछ बैठी मै उससे....
' क्यूँ चुप है ? देश तो कबका आज़ाद हो गया,'तू भी कुछ बोल '....
वह फीकी सी हंसी हंस के बोली,''क्या बोलूं ! कैसी आज़ादी मेमसाब .
मै तो आज भी मारी जाती हूं ...जो कुछ भी कमा के लाती हूं,उसे दुसरे के हाथों गवां देती हूं,''
कहती है,''मेमसाब ! दर्पण देखना अच्छा लगता है
पर जब नील और चोट के निशान देखती हूं मन कडुवाहट से भर जाता है
हर रोज़ एक मन दर्पण चूर-चूर जाता है
पर क्या करूँ! नारी मन तब भी दर्पण देखना चाहता है,''
तब मुझे लगा ...सहज सुन्दर, बंधन-मुक्त ,उल्लास का प्रतिबिम्ब
ढूँढ रहा है,उसका मन....
उसका नारी मन दर्पण देखना चाहता है
श्रृंगार करना चाहता है
जाने क्यूँ आस लगाए बैठा है............
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