रिश्ते.....
रिश्ते.....
तारुफ़ , तालुक़ में तकलूफ़ निभाना है लाज़मी
बेबाकी ले आती है रिश्तों में दूरी
कांच के मुआफिक होते हैं ये रिश्ते
नाज़ुक से कोमल .....
फिर बनते है किस्से
टूटते हैं तब आवाज़ भी हो जाती है खामोश
सलामत रहतें हैं आईनें टूट जातें हैं चेहरें
नसीहत मिली है यही विरासत में
उम्मीदें हों ज़्यादा तो बिखरते हैं रिश्ते......
तारुफ़ , तालुक़ में तकलूफ़ निभाना है लाज़मी
बेबाकी ले आती है रिश्तों में दूरी
कांच के मुआफिक होते हैं ये रिश्ते
नाज़ुक से कोमल .....
फिर बनते है किस्से
टूटते हैं तब आवाज़ भी हो जाती है खामोश
सलामत रहतें हैं आईनें टूट जातें हैं चेहरें
नसीहत मिली है यही विरासत में
उम्मीदें हों ज़्यादा तो बिखरते हैं रिश्ते......
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