कभी सोचा है ....?
बिन आवाजों के मेरा ये शहर कैसा लगेगा ?
साज़ सब टूटे पड़े ........साजिन्दे चुप !
नज्मे बेकरार ............गीतकार चुप !!
पंछी आसमानों में........भवरें की गुनगुन चुप !
महफ़िलें सजतीं ..........कहकहे गुल !!
मंदिरों में घंटों के बजते स्वर एकाएक चुप !
मस्जिदों से उठती अजाँ का लुत्फ़ भी गुल !
राहगीरों की राहें भी चुप.....
न सीटी न 'होर्न ' न शोर कोई
न गाड़ी न 'मोटर ' न होड़ कोई !
हैरान परेशान मैं......
कहाँ ले आयी मेरी तन्हाई मुझे ?
सारे शहर
में न कोई अपना न बेगाना
न मैं किसी को पुकारूँ न
मुझे कोई आवाज़ दे
हद तो हुई तब,जब लगा खुद को खुद ही पुकारूँ
कमसकम कोई आवाज़ तो आएगी !
बिन आवाजों का ये शहर मेरा नहीं लगे !!
अपना सा
नहीं लगे .....!!!
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