Wednesday, September 25, 2013

कभी सोचा है ....?
बिन आवाजों के मेरा ये शहर  कैसा लगेगा  ?
साज़  सब टूटे  पड़े ........साजिन्दे चुप !
नज्मे  बेकरार ............गीतकार  चुप  !!
पंछी  आसमानों  में........भवरें की गुनगुन  चुप !
महफ़िलें  सजतीं  ..........कहकहे  गुल  !!
मंदिरों  में घंटों के बजते स्वर एकाएक  चुप !
मस्जिदों से उठती अजाँ  का लुत्फ़  भी गुल !
राहगीरों  की  राहें भी  चुप.....
 सीटी   'होर्न '   शोर  कोई 
 गाड़ी   'मोटर '   होड़  कोई !
हैरान  परेशान मैं......
कहाँ ले आयी  मेरी तन्हाई मुझे ?
सारे शहर  में कोई अपना   बेगाना
मैं किसी को पुकारूँ    मुझे  कोई आवाज़  दे
हद  तो हुई तब,जब लगा खुद को खुद ही पुकारूँ 
कमसकम  कोई आवाज़ तो आएगी  !
बिन  आवाजों का ये शहर मेरा नहीं लगे !!

   अपना  सा  नहीं  लगे .....!!!

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