Wednesday, September 25, 2013

तुम्हारी स्मृति

February 7, 2012 at 3:38pm
 वक़्त के इस पहर में
जब मैं जी रही होती
तब कहीं और भी तो
कोई मुझे जी रहा होता
तुम्हारी ही स्मृति में रहती क़ैद
वहीँ से तुम देते अनवरत  ऊर्जा मुझे
नया उल्लास;नया जोश
फिर मुझे आवेग के साथ
बढाते आने वाले जीवन की ओर

घड़घड़आते हुए मेघ लाते तुम्हारा पैगाम
मस्त पवन से आती तुम्हारी खुशबु
कर देती मन आँगन सराबोर
बौद्ध से मौन जीते पलों में
रिश्तों को मिलता एक और नया  आशय
बनती जाती मजबूत इनकी डोर

तुम्हारी अगुवाई में फिर से चहकते
मेरे अनगिनत सपने
चल पड़ता अटूट सिलसिला  कल्पनाओं का
होते यथार्थ सभी सपने
प्रतीत होते सभी अपने

तुम्हारी स्मृति
इस बेरुखे बयाबान में
ले आती 'कोपु'.'अजार' की खिली छवि
बरसते मेघ उफनती नदी
और गगन की तारिकाओं की
उजली ,निश्छल हंसी

तुम्हारी स्मृति मुझे
मेरी स्मृति के विशाल गगन पट
पर दे जाती तुम्हारे वजूद की दस्तक
तुम्हारी स्मृति ही मुझे
सहेज कर जीवन जीना सिखाती
मेरे चेहरे की मुस्कराहट बनाती
अनवरत ऊर्जा प्रदान कर अग्रसर कराती
तुम्हारी स्मृति मुझे
जीने का लक्ष्य दे जाती
तुम्हारी स्मृति.......

No comments:

Post a Comment