पत्झढ़ का अर्थ तो बसंत आने की बारी है
मधुर सुमधुर ब्यार बहती है
डाल डाली कलि हर महकी है
खिल रही हर ओर पिली सरसों
छा रही हरियाली जैसे गुल ना हुई बरसों
शीत को विदा कहने बसंत आई है
झिल-मिल बेल-बूटे फूल-पत्ती संग बसंत मुस्काई है....
कितने दिन पहरे डाले अम्बर ने
कितने ही घने बादल ओढ़े सूरज ने
पर कर्मों की गति न्यारी है !
पत्झढ़ का अर्थ तो बसंत आने की बारी है..!
जैसे राजाओं से महल दो महले छूटे
ना जाने कितने ही राज मुकुट टूटे
गांधारी ने पट्टी आँखों पर डाली थी
भीष्म पिताह्मः के मौन रहने की बारी थी
पर हर अँधेरे में एक चिंगारी थी
बसंत के आने की बारी थी....
कोयल कूके डाली डाली
राधा नाचे श्याम संग हो मतवारी
बौर फूटे बगियों में
गुन-गुन भवरें डोले फूलों की गलियों में
पिघली बर्फ की चादर है
पत्झढ़ का अर्थ तो बसंत आने की बारी है...
बसंत आने की बारी है....! !
डाल डाली कलि हर महकी है
खिल रही हर ओर पिली सरसों
छा रही हरियाली जैसे गुल ना हुई बरसों
शीत को विदा कहने बसंत आई है
झिल-मिल बेल-बूटे फूल-पत्ती संग बसंत मुस्काई है....
कितने दिन पहरे डाले अम्बर ने
कितने ही घने बादल ओढ़े सूरज ने
पर कर्मों की गति न्यारी है !
पत्झढ़ का अर्थ तो बसंत आने की बारी है..!
जैसे राजाओं से महल दो महले छूटे
ना जाने कितने ही राज मुकुट टूटे
गांधारी ने पट्टी आँखों पर डाली थी
भीष्म पिताह्मः के मौन रहने की बारी थी
पर हर अँधेरे में एक चिंगारी थी
बसंत के आने की बारी थी....
कोयल कूके डाली डाली
राधा नाचे श्याम संग हो मतवारी
बौर फूटे बगियों में
गुन-गुन भवरें डोले फूलों की गलियों में
पिघली बर्फ की चादर है
पत्झढ़ का अर्थ तो बसंत आने की बारी है...
बसंत आने की बारी है....! !
No comments:
Post a Comment