Wednesday, September 25, 2013

पत्झढ़ का अर्थ तो बसंत आने की बारी है

February 1, 2012 at 7:02pm
    मधुर  सुमधुर ब्यार बहती है
   डाल डाली कलि हर महकी है
  खिल रही हर ओर पिली सरसों
   छा रही हरियाली जैसे गुल ना हुई बरसों
 शीत को विदा कहने बसंत आई है
 झिल-मिल बेल-बूटे फूल-पत्ती संग बसंत मुस्काई है....

 कितने दिन पहरे डाले अम्बर ने
 कितने ही घने बादल ओढ़े सूरज ने
 पर कर्मों की गति न्यारी है !
 पत्झढ़ का अर्थ तो बसंत आने की बारी है..!

 जैसे राजाओं से महल दो महले छूटे
  ना जाने कितने ही राज मुकुट टूटे
 गांधारी ने पट्टी आँखों पर डाली थी
 भीष्म पिताह्मः  के मौन रहने की बारी थी
 पर हर अँधेरे में एक चिंगारी थी
 बसंत के आने की बारी थी....

कोयल कूके डाली डाली
राधा नाचे श्याम संग हो मतवारी
बौर फूटे बगियों में
गुन-गुन भवरें डोले फूलों की गलियों में
पिघली बर्फ की चादर है
पत्झढ़ का अर्थ तो बसंत आने की बारी है...
बसंत आने की बारी है....! !

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